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मंकू की भूल: एहसान का बदला धोखा | Panchtantra Story

मुसीबत में की गई मदद कभी-कभी जानलेवा हो सकती है। पढ़िए 'कोई नहीं है अपना' की यह जंगल कहानी, जहाँ मंकू बंदर ने एक सांप पर भरोसा करके बड़ी गलती की।

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Koi Nahi Hai Apna: मंकू बंदर और धोखेबाज़ नाग की कहानी

Focus Keyword: Koi Nahi Hai Apna (कोई नहीं है अपना) SEO Title: Koi Nahi Hai Apna: मंकू बंदर और काले नाग की पंचतंत्र कहानी (Moral Story) SEO Slug:koi-nahi-hai-apna-snake-monkey-story-hindiMeta Description: 

कहानी के बारे में (Intro)

बचपन से हमें सिखाया जाता है कि "कर भला तो हो भला।" लेकिन जंगल का कानून और कभी-कभी इंसानी दुनिया का भी एक कड़वा सच यह है कि कुछ लोगों की फितरत कभी नहीं बदलती। आप चाहे उनके लिए कितना भी अच्छा कर लें, मौका मिलते ही वे डसने से नहीं चूकते। यह कहानी 'विशालाक्षी वन' के एक नटखट लेकिन दयालु बंदर मंकू की है, जिसे लगा कि उसकी अच्छाई एक ज़हरीले नाग को दोस्त बना लेगी। लेकिन अंत में उसे समझ आया कि मुसीबत के वक्त Koi Nahi Hai Apna, सिवाय अपनी बुद्धि के।

कहानी: एहसान का बदला ज़हर

मंकू की दयालुता

विशालाक्षी वन में मंकू नाम का एक बंदर रहता था। मंकू का दिल मोम जैसा नरम था। अगर किसी पक्षी का घोंसला गिर जाता, तो वह उसे उठा देता। अगर कोई गिलहरी रास्ता भटक जाती, तो उसे घर पहुंचा देता।

उसकी माँ उसे अक्सर समझाती थीं, "बेटा मंकू, दया करना अच्छी बात है, लेकिन पात्र और कुपात्र (Deserving and Undeserving) का ध्यान रखना ज़रूरी है। हर कोई तुम्हारी मदद के लायक नहीं होता।" लेकिन मंकू अपनी धुन का पक्का था। उसे लगता था कि प्यार से पत्थर को भी पिघलाया जा सकता है।

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पत्थर के नीचे दबी मौत

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एक दिन मंकू जंगल के रास्ते से गुजर रहा था कि उसे किसी के कराहने की आवाज़ आई। "बचाओ! कोई है? मेरी मदद करो!"

मंकू ने नीचे देखा। एक भारी-भरकम चट्टान के नीचे एक विशाल काला नाग (कालिया) फंसा हुआ था। शायद पहाड़ी से पत्थर लुढ़क कर उसकी पूंछ पर गिर गया था। कालिया दर्द से तड़प रहा था।

मंकू को देखते ही कालिया नाग गिड़गिड़ाया, "हे वानर राज! तुम तो बहुत बलवान और दयालु लगते हो। देखो, मैं इस पत्थर के नीचे दब गया हूँ। अगर तुमने मुझे नहीं निकाला, तो मैं यहीं मर जाऊंगा। मेरी मदद करो!"

मंकू ठिठक गया। उसे पता था कि सांपों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उसने कहा, "नाग राज, मैं तुम्हारी मदद तो कर दूँ, लेकिन तुम्हारा क्या भरोसा? बाहर निकलते ही तुम मुझे डस लोगे। तुम्हारा तो स्वभाव ही है डसना।"

कालिया ने कसम खाई, "नहीं-नहीं भाई! तुम मेरी जान बचाओगे, मैं तुम्हें कैसे डस सकता हूँ? मैं वचन देता हूँ कि मैं तुम्हारा आजीवन ऋणी रहूंगा। हम दोस्त बनकर रहेंगे।"

मंकू का दिल पिघल गया। उसने सोचा कि मुसीबत में पड़े जीव की मदद न करना पाप होगा। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस भारी पत्थर को धकेला। पत्थर हिल गया और कालिया नाग आज़ाद हो गया।

फितरत का रंग

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आज़ाद होते ही कालिया ने एक गहरी सांस ली और अपनी कुंडली (Coil) खोली। मंकू ने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो भाई, अब तुम आज़ाद हो। अपना ध्यान रखना।"

लेकिन कालिया जाने के बजाय मंकू की तरफ ही बढ़ने लगा। उसकी आँखों में अब लाचारी नहीं, क्रूरता थी। उसने फुफकारते हुए मंकू का रास्ता रोक लिया।

"यह क्या कर रहे हो?" मंकू घबराया। "मैंने अभी तुम्हारी जान बचाई है।"

कालिया हँसा, "हाँ, बचाई तो है। लेकिन मैं कई दिनों से इस पत्थर के नीचे दबा था। मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है। और सामने इतना सेहतमंद बंदर हो, तो मैं शिकार ढूंढने और कहीं क्यों जाऊं?"

मंकू को अपनी माँ की बात याद आ गई। उसने कांपते हुए कहा, "लेकिन तुमने वचन दिया था! यह धोखा है!"

कालिया ने अपनी जीभ लपलपाई, "धोखा नहीं, यह मेरी फितरत है। और वैसे भी, इस जंगल में कोई नहीं है अपना। यहाँ तो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का नियम चलता है। तुम मूर्ख थे जो मुझ पर भरोसा किया।"

लोमड़ी की अदालत (Logic और तर्क)

मंकू समझ गया कि वह फंस चुका है। अगर वह भागा, तो नाग उसे डस लेगा। उसे ताकत से नहीं, दिमाग से काम लेना था। तभी उसे झाड़ियों के पीछे से एक लोमड़ी (मौसी) आती दिखाई दी। मंकू ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "अरे लोमड़ी मौसी! ज़रा रुको! यहाँ एक धर्म-संकट आन पड़ा है। हमारा फैसला कर दो, फिर यह नाग मुझे शौक से खा ले।"

लोमड़ी बहुत चालाक थी। वह रुकी और बोली, "क्या हुआ? इतना शोर क्यों मचा रहे हो?"

मंकू ने पूरी बात बताई कि कैसे उसने नाग को पत्थर के नीचे से निकाला और अब नाग उसे खाना चाहता है। लोमड़ी ने जानबूझकर अनजान बनते हुए कहा, "मुझे तुम्हारी बात समझ नहीं आ रही। इतना बड़ा नाग, और इस छोटे से पत्थर के नीचे? यह मुमकिन ही नहीं है। तुम झूठ बोल रहे हो।"

कालिया नाग को अपनी सच्चाई साबित करने की जल्दी थी। वह बोला, "अरे मूर्ख लोमड़ी! मैं झूठ नहीं बोल रहा। मैं सचमुच इस पत्थर के नीचे दबा था।"

लोमड़ी ने सिर हिलाया, "मैं आँखों देखी पर ही विश्वास करती हूँ। पहले मुझे दिखाओ कि तुम कैसे दबे थे, तभी मैं मानूंगी और फैसला सुनाऊंगी।"

वापसी उसी जाल में

नाग ने सोचा कि एक बार लोमड़ी को यकीन दिला दूँ, फिर बंदर और लोमड़ी दोनों का नाश्ता करूँगा। कालिया वापस उस जगह गया और अपनी पूंछ को उस जगह रखा जहाँ पत्थर था। "देखो, मैं ऐसे लेटा था," नाग बोला।

लोमड़ी ने कहा, "और पत्थर कहाँ था?" नाग ने कहा, "पत्थर मेरे ऊपर था।"

लोमड़ी ने मंकू की तरफ आँख मारी और बोली, "मंकू, ज़रा पत्थर वापस रखकर दिखाओ तो, कि यह कैसे दबा था?" मंकू तुरंत समझ गया। उसने झट से वही भारी पत्थर लुढ़काया और वापस कालिया नाग की पूंछ और आधे शरीर पर गिरा दिया।

"आह! मर गया!" कालिया फिर से दर्द से चिल्लाया। "हटाओ इसे! मैं दब गया हूँ!"

लोमड़ी मुस्कुराई और बोली, "बस, अब वहीं रहो। तुम जैसे धोखेबाज़ों की यही जगह है।" मंकू ने राहत की सांस ली।

लोमड़ी ने मंकू से कहा, "मंकू भाई, याद रखना। दुष्ट के साथ भलाई करना, खुद के साथ बुराई करने जैसा है। आज मैंने बचा लिया, लेकिन हर बार कोई तीसरा नहीं आएगा।"

निष्कर्ष: असली सीख

मंकू ने लोमड़ी को धन्यवाद दिया और उस दिन एक कसम खाई। उसने सीखा कि आँख मूंदकर किया गया भरोसा मूर्खता है। जंगल में या जीवन में, अपनी सुरक्षा अपने हाथ में ही होती है।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह महत्वपूर्ण सीख मिलती है:

  1. स्वभाव नहीं बदलता: नीम पर कितना भी शहद डालो, वह मीठा नहीं होता। वैसे ही दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव मदद पाने के बाद भी नहीं बदलता।

  2. बुद्धि ही बल है: जब शारीरिक ताकत काम न आए, तो बुद्धि का प्रयोग करके बड़ी से बड़ी मुसीबत से निकला जा सकता है।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: पंचतंत्र - विकिपीडिया

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